राजाजनक ने सीता स्वयंवर में अयोध्या नरेश राजा दशरथ को आमंत्रण क्यों नहीं भेजा ???

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रामु अमित गुन सागर थाह कि पावइ कोइ।*
*संतन्ह सन जस किछु सुनेउँ तुम्हहि सुनायउँ सोइ॥

भावार्थ:-श्री रामजी अपार गुणों के समुद्र हैं, क्या उनकी कोई थाह पा सकता है? संतों से मैंने जैसा कुछ सुना था, वही आपको सुनाया है॥
राजा जनक के शासनकाल में एक व्यक्ति का विवाह हुआ। जब वह पहली बार सज-सँवरकर ससुराल के लिए चला, तो रास्ते में उसे चलते-चलते एक जगह उसको दलदल मिला, जिसमें एक बृद्ध गाय फँसी हुई थी, जो कि लगभग मरने के कगार पर थी। तो उसने उस समय अपने मन मे विचार किया कि गाय तो अव से कुछ ही देर में मरने वाली है तथा इस कीचड़ में जाने पर मेरे कपड़े तथा जूते खराब हो जाएँगे, अतः उसने गाय के ऊपर अपना पैर रखकर आगे बढ़ गया। जैसे ही वह आगे बढ़ा तभी उस गाय ने तुरन्त अपना दम तोड़ दिया तथा उस गाय ने उस व्यक्ति को शाप दिया कि जिसके लिए तू जा रहा है, उसे तू देख नहीं पाएगा, यदि तू उसे देखेगा भी तो वह भी तुरन्त मृत्यु को प्राप्त हो जाएगी। यह सुनकर वह व्यक्ति अपार दुविधा में फँस गया और गौ-शाप से मुक्त होने का विचार करने लगा। वह अपनी ससुराल पहुँचकर वह दरवाजे के बाहर घर की ओर पीठ करके बैठ गया और यह विचार करने लगा कि यदि मेरी किसी भी तरह से पत्नी पर नजर पड़ी, तो कोई अनिष्ट नहीं हो जाए। तो उसेपरिवार के अन्य सदस्यों ने घर के अन्दर चलने का काफी अनुरोध किया, किन्तु वह अन्दर नहीं गया और न ही उसने रास्ते में घटित हुई उस घटना के बारे में किसी को भी बताया।लेकिन
उसकी पत्नी को जब पता चला, तो उसने कहा कि चलो, मैं ही स्वयं चलकर उन्हें घर के अन्दर लाती हूँ। पत्नी ने जब उससे कहा कि आप मेरी तरफ क्यों नहीं देखते हो, तो भी वह चुपही रहा। उसके काफी अनुरोध करने के उपरान्त उसने रास्ते का सारा वृतान्त कह सुनाया। तो उसे सुनते ही उसकी पत्नी ने कहा कि हे पतिदेवमैं भी तो एक पतिव्रता स्त्री हूँ। आपके साथ ऐसा कैसे हो सकता है? आप मेरी ओर अवश्य देखो। पत्नी की ओर देखते ही तुरंत उसकी आँखों की रोशनी चली गई और वह गाय के शापवश पत्नी को नहीं देख सका। उसके बाद वह
पत्नी अपने पति को साथ लेकर राजा जनक के दरबार में गई और राजा जनक के दरबार मे उसनेसारा कह बृतान्त कह सुनाया। तो राजा जनक ने राज्य के सभी विद्वानों को अपनी सभा में बुलाकर समस्या बताई और गौ-शाप से निवृत्ति होने का सटीक उपाय पूछा।
सभी विद्वानों ने आपस में गहन मन्त्रणा करके एक उपाय सुझाया कि, यदि कोई पतिव्रता स्त्री छलनी में गंगाजल लाकर उस जल के छींटे इस व्यक्ति की दोनों आँखों पर लगाए, तो इस व्यक्ति को गौ-शाप से मुक्ति मिल जाएगी और इसकी आँखों की रोशनी पुनः लौट सकती है। यह सुनकर
राजा ने पहले अपने महल के अन्दर की रानियों सहित सभी स्त्रियों से पूछा, तो राजा को अपने महल की सभी स्त्रियोंके पतिव्रता होने में संदेह की सूचना मिली। अब तो राजा जनक बहुत चिन्तित हो गए। तब उन्होंने आस-पास के सभी राजाओं को सूचना भेजी कि उनके राज्य में यदि कोई पतिव्रता स्त्री है, तो उसे सम्मान सहित राजा जनक के दरबार में भेजा जाए।
जब यह सूचना अयोध्या के राजा दशरथ (अयोध्या नरेश) को मिली, तो उन्होने पहले अपनी सभी रानियों से पूछा। प्रत्येक रानी का यही उत्तर था कि राजमहल तो क्या आप राज्य की किसी भी महिला यहाँ तक कि झाडू लगाने वाली, जो कि उस समय अपने कार्यों के कारण सबसे निम्न श्रेणी की मानी जाती थी, यदि आप उससे भी पूछेंगे, तो उसे भी आप पतिव्रता ही पाएँगे।
राजा दशरथ को इस समय अपने राज्य की महिलाओं पर बढा आश्चर्य हुआ और उन्होने राज्य की सबसे निम्न मानी जाने वाली सफाई वाली महिला को बुलावा भेजा और उसके पतिव्रता होने के बारे में पूछा। तो उस महिला ने स्वीकृति में तुरंत अपनी गर्दन हिला दी।
तब राजा ने यह दिखाकर यह साबित करलिया कि अयोध्या का राज्य अपने आसपास के राज्यों मे सबसे उत्तम है, तो राजा ने उस महिला को ही पूरेराज-सम्मान के साथ जनकपुर को भेज दिया। राजा जनक ने उस महिला का पूर्ण राजसी ठाठ-बाट से सम्मान किया और उसे सारी समस्या बताई। तो उस महिला ने उस कार्य को करने की स्वीकृति दे दी।
वह महिला एक छलनी लेकर गंगा किनारे गई और उसने गँगा माता से प्रार्थना की कि, ‘हे गंगा माता! यदि मैं पूर्ण पतिव्रता हूँ, तो गंगाजल की एक बूँद भी नीचे नहीं गिरनी चाहिए।’ इस तरह से वह महिला गँगा माता से अपनी
प्रार्थना करके उसने गंगाजल को छलनी में पूरा भर लिया और उसने देख पाया कि जल की एक बूँद भी नीचे नहीं गिरी। तब उसने यह सोचकर कि यह पवित्र गंगाजल कहीं रास्ते में छलककर नीचे नहीं गिर जाए, उसने उसमें से थोड़ा-सा गंगाजल नदी में ही गिरा दिया और पानी से भरीहुई उस छलनी को लेकर राजदरबार में चली आयी।
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तब राजा और उनके दरबार में उपस्थित सभी नर-नारी यह दृश्य देखकर आश्चर्यचकित रह गए तथा उस महिला को ही उन्होंने उस व्यक्ति की आँखों पर छींटे मारने का अनुरोध किया तथा उस महिला के द्वारा छीटे लगाते ही वह व्यक्ति गाय के शाप से मुक्त हुआ और उसकी आँखों की रोशनी तुरंत लौट आई यह देखकर राजा ने उस महिला को पूर्ण राजसम्मान देकर काफी पारितोषिक दिया।
तब उस महिला ने राजा से अपने राज्य को वापस जाने की अनुमति माँगी, तो राजा जनक ने अनुमति देते हुए जिज्ञाशावश उस महिला से उसकी जाति के बारे में पूछा। तो महिला केद्वारा अपनी जाति बताए जाने पर, राजा आश्चर्यचकित रह गए।
तव राजा जनक ने
सीता स्वयंवर के समय यह विचार कर कि जिस राज्य की सफाई करने वाली महिला इतनी पतिव्रता हो सकती है, तो उसका पति कितना शक्तिशाली होगा?
यदि राजा दशरथ ने उसी प्रकार के किसी व्यक्ति को स्वयंवर में भेज दिया, तो वह तो धनुष को आसानी से संधान कर सकेगा और कहीं राजकुमारी किसी निम्न श्रेणी के व्यक्ति को न वर ले, यह सोचकर अयोध्या नरेश राजा दशरथ को राजा जनक ने सीता स्वयंवर के समय निमन्त्रण नहीं भेजा, किन्तु विधाता की लेखनी को कौन मिटा सकता है?

अयोध्या के राजकुमार वन में विचरण करते हुए अपने गुरु के साथ जनकपुर पहुँच ही गए और धनुष तोड़कर राजकुमार राम ने सीता को वर ही लिया।

