१. राजा त्रिशंकु की विचित्र इच्छा-
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राजा त्रिशंकु (जिन्हें सत्यव्रत भी कहा जाता था) एक प्रतापी राजा थे, लेकिन उनके मन में एक अजीब महत्वाकांक्षा जागी—वे अपने इसी नश्वर शरीर (सदेह) के साथ स्वर्ग जाना चाहते थे।
गुरु वशिष्ठ का इनकार: -त्रिशंकु अपने कुलगुरु महर्षि वशिष्ठ के पास गए और उनसे ऐसा यज्ञ कराने को कहा। वशिष्ठ जी ने साफ़ मना कर दिया कि प्रकृति के नियमों के विरुद्ध सदेह स्वर्ग जाना असंभव है।
वशिष्ठ पुत्रों का श्राप: -निराश होकर त्रिशंकु वशिष्ठ के पुत्रों के पास गए। उन्होंने इसे अपने पिता का अपमान माना और क्रोध में आकर त्रिशंकु को ‘चांडाल’ हो जाने का श्राप दे दिया। राजा का सुंदर रूप कुरूप हो गया।
विश्वामित्र का हठ और ‘त्रिशंकु स्वर्ग’-
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अपमानित राजा त्रिशंकु महर्षि विश्वामित्र की शरण में गए। वशिष्ठ से प्रतिद्वंद्विता के कारण विश्वामित्र ने त्रिशंकु की मदद करने की ठान ली।
१. विश्वामित्र ने अपने तपोबल से एक भारी यज्ञ किया और त्रिशंकु को सशरीर स्वर्ग भेज दिया।
२. जैसे ही त्रिशंकु स्वर्ग पहुंचे, देवराज इंद्र ने उन्हें नियमों के विरुद्ध पाकर सिर के बल वापस धरती की ओर फेंक दिया।
३. त्रिशंकु हवा में लटक कर चिल्लाने लगे। तब विश्वामित्र ने अपने तपोबल से उन्हें हवा में ही रोक दिया और अपनी शक्ति से एक नए स्वर्ग (त्रिशंकु स्वर्ग) की रचना शुरू कर दी।
४. देवताओं के अनुरोध पर अंततः एक समझौता हुआ: त्रिशंकु उसी अधर (हवा) में लटके रहेंगे, वे स्वर्ग के देवताओं में शामिल नहीं होंगे, लेकिन एक नक्षत्र के रूप में स्थापित रहेंगे। तभी से दुविधा में फंसे व्यक्ति के लिए “त्रिशंकु होना” मुहावरा बना।
राधे राधे


