।।🌹।।देवलोक से बड़ा है पितृलोक क्योंकि देवताओं के भी पितृ होते है।।🌹।।
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बाबा तुलसीदास जी ने भी इस संबंध मे लिखा है-
तुलसी चातक देत सिख,
सुतहि बारहीं बार।
तात न तर्पन कीजिए
बिना बारिधर धार-
तुलसीदासजी कहते है कि चातक अपने पुत्र को बारंबार यही सीख देता है कि हे तात ( मेरे मरने पर)
प्यारे मेघ की धारा को छोड़कर अन्य किसी जल से मेरा तर्पण न करना।
जब पक्षी भी अपनी सन्तान को तर्पण करने को कहता है तो हमें भी अपने पूर्वजों का विधि विधान से तर्पण करना चाहिए।
कृतज्ञता प्रकट करने का समय
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पितृ पक्ष अपने पूर्वजो के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने, उनका स्मरण करने और उनके प्रति श्रद्धा अभिव्यक्त करने का महापर्व है।इस अवधि में पितृगण अपने परिजनों से स्वयं के मोक्ष के लिए तर्पण की इच्छा रखते हैं।
ब्रह्मवैवर्तपुराण पुराण के अनुसार
संसार में जो गृहस्थ अपने पितरों को श्रद्धापूर्वक पिंडदान तिलांजली और ब्राह्मणों को भोजन करवाते हैं, उनके पितृ प्रशन्न होते हैं।
पितृ होते हैं संतुष्ट-
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अग्निपुराण के अनुसार वसु, रूद्र, एवं आदित्य श्राद्ध के देवता माने जाते हैं, इनका आह्वान कर किये गये श्राद्ध से पितृ संतुष्ट होते हैं।
मनुस्मृति से-
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मनुष्य के तीन पूर्वजों यथा- पिता, पितामह, एवं प्रपितामह इन सभी पितृ- देवों को वसुओं, रूद्रों, और आदित्यों के समान माना है।
श्राद्ध करते समय इन्हीं देवताओं को पूर्वजों का प्रतिनिधि मानना चाहिए।यही पित्र दोष और पित्र शान्ति का उपाय है


