आध्यात्मिक ज्ञान मे आज आप देखे राजा नहुष की कथा इस कथा के लेख को पूरा पढने के लिए नीचेदीगई लिक पर क्लिक करें-डा०-दिनेश कुमार शर्मा चीफ एडीटर एम.बी.न्यूज-24💐💐💐💐💐💐💐💐💐

1. नहुष का स्वर्ग का राजा (इंद्र) बनना-

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राजा नहुष चंद्रवंश के एक अत्यंत प्रतापी, धर्मात्मा और शक्तिशाली राजा थे। उन्होंने अपने जीवन में सौ अश्वमेध यज्ञ किए थे और अपनी प्रजा का पालन बहुत अच्छी तरह किया था।

एक समय ऐसा आया जब देवराज इंद्र से ब्रह्महत्या का पाप हो गया (वृत्रासुर के वध के कारण), और वे प्रायश्चित करने के लिए स्वर्ग छोड़कर कहीं छिप गए। इंद्र के बिना स्वर्ग का सिंहासन खाली हो गया, जिससे सृष्टि का संतुलन बिगड़ने लगा। तब सभी देवताओं और ऋषियों ने मिलकर यह निर्णय लिया कि पृथ्वी के सबसे सदाचारी राजा नहुष को स्वर्ग का राजा (इंद्र) बना दिया जाए।

2. अहंकार का जन्म-

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स्वर्ग का राजा बनते ही नहुष के पास अपार शक्तियां, अमरता और स्वर्ग का ऐश्वर्य आ गया। प्रारंभ में तो उन्होंने ठीक से शासन किया, लेकिन धीरे-धीरे स्वर्ग के भोग-विलास और असीमित शक्ति ने उनके विवेक को नष्ट कर दिया। वे अहंकारी हो गए।

एक दिन उनकी दृष्टि इंद्र की पत्नी शची (इन्द्राणी) पर पड़ी। काम के वश में होकर नहुष ने संदेश भिजवाया कि अब वे स्वर्ग के राजा हैं, इसलिए शची को उनकी पत्नी बन जाना चाहिए।

3. शची और देवगुरु बृहस्पति की योजना-

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इन्द्राणी शची इस बात से बहुत दुखी और भयभीत हुईं। वे मदद के लिए देवगुरु बृहस्पति के पास गईं। बृहस्पति जी ने शची को ढांढस बंधाया और नहुष को फंसाने के लिए एक चतुर योजना बनाई।

शची ने नहुष को संदेश भेजा:

“मैं आपकी पत्नी बनने के लिए तैयार हूँ, लेकिन मेरी एक शर्त है। आप मेरे पास एक ऐसी सवारी पर आएं, जो आज तक किसी के पास न रही हो। आप ऋषियों और महर्षियों द्वारा खींची जाने वाली पालकी (शिविका) में बैठकर आएं।”

4. ऋषियों का अपमान और ‘सर्प’ बनने का श्राप-

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अहंकार और काम-वासना में अंधे हो चुके नहुष को सही-गलत का होश नहीं रहा। उन्होंने सप्तऋषियों (जिनमें अगस्त्य और भृगु जैसे महान ऋषि शामिल थे) को अपनी पालकी उठाने के काम पर लगा दिया।

ऋषि आकार में छोटे थे और नहुष को शची से मिलने की इतनी जल्दी थी कि वे पालकी में बैठे-बैठे बार-बार ऋषियों को तेज चलने के लिए टोक रहे थे। जल्दीबाजी में नहुष ने महान ऋषि अगस्त्य के सिर पर अपने पैर से ठोकर मार दी और कहा—”सर्प, सर्प!” (संस्कृत में ‘सर्प’ का एक अर्थ ‘तेज चलो’ भी होता है)।

ऋषि अगस्त्य नहुष के इस दुस्साहस और अपमान से अत्यंत क्रोधित हो गए। उन्होंने तुरंत नहुष को श्राप दिया:

“अहंकारी नहुष! तूने ब्रह्मतेज का अपमान किया है और ऋषियों को लात मारी है। तू स्वर्ग के राजा बनने के योग्य नहीं है। तू अभी इसी वक्त स्वर्ग से गिरकर पृथ्वी पर ‘महान अजगर’ (सर्प) बन जा!”

5. मुक्ति का उपाय-

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श्राप मिलते ही नहुष का अहंकार चूर-चूर हो गया। वे ऋषियों के पैरों में गिर पड़े और क्षमा मांगने लगे।

ऋषि अगस्त्य दयालु भी थे, इसलिए उन्होंने कहा कि श्राप पूरी तरह वापस तो नहीं हो सकता, लेकिन द्वापर युग में जब चंद्रवंश में ही जन्में युधिष्ठिर तुम्हारे प्रश्नों के सही उत्तर देंगे, तब तुम्हें इस सर्प योनि से मुक्ति मिलेगी और तुम वापस स्वर्ग जा सकोगे।

कथा का अंत (युधिष्ठिर से मिलन)-
हजारों वर्षों बाद, महाभारत काल में जब पांडव वनवास में थे, तब एक विशाल अजगर (नहुष) ने भीम को जकड़ लिया था। भीम को बचाने आए युधिष्ठिर से उस अजगर ने धर्म, ज्ञान और ब्राह्मण के लक्षणों पर कई कठिन प्रश्न पूछे। युधिष्ठिर के धर्मपूर्ण उत्तरों से संतुष्ट होकर नहुष का पाप नष्ट हो गया, वे सर्प योनि से मुक्त हुए और उन्हें वापस उत्तम लोक की प्राप्ति हुई।

सीख: यह कथा हमें सिखाती है कि व्यक्ति चाहे कितना भी शक्तिशाली, समृद्ध या ऊंचे पद पर क्यों न पहुंच जाए, यदि वह अपना विवेक खो देता है और अहंकार में चूर होकर बड़ों व ज्ञानियों का अपमान करता है, तो उसका पतन निश्चित है।

राधे राधे

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